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Description of the Book:

 

यह पुस्तक मेरे जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा और उसमें आने वाली विभिन्न बाधाओं को हरा कर आगे निकलने की, रोज़ खुदसे संघर्ष करने की, मुझे गिराने की योजना बनाने वालों को अपनी लेखनी से जवाब देने की यात्रा का वर्णन करती है। किस तरह से पिता का साया उठ जाने से जो खालीपन पैदा होता है वो भरा नहीं जा सकता, किस तरह नकारात्मक लोगों के साथ रिश्ता ढ़ोना एक मजबूरी बन जाने पर आपको अंदर तक खोखला करता रहता है और उस खोखले स्थान पर हज़ार प्रश्न भर देता है, जो आपको वजूद को लेकर, दूसरों के व्यवहार को लेकर, समाज के दोगलेपन दिखावे को लेकर होते हैं। इस पुस्तक में स्वयं से प्रेम करने की कविताएं भी हैं। तो स्वयं से संघर्ष की कविताएं हैं। समाज की कुंठा पर प्रश्न हैं। तो स्त्रियों के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिए आवश्यक प्रश्न भी हैं। कुल मान कर कह सकते हैं कि इस कविता की पुस्तक में एक पढ़ी-लिखी लड़की, जो अपना एक वजूद, अपनी सोच, अपनी विचारधारा रखती है। उसे किन - किन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ता है तथा वो किस तरह हर बार न चाहते हुए भी ऐसे लोगों की कसौटी पर परखी जाती है, जिनसे उसे फर्क भी नहीं पड़ता है। लेकिन ये समाज है, उन्हीं चार लोगों का समाज, कि चार लोग क्या कहेंगे। जीवन के लगभग 25 साल इतनी आसानी से कटे कि कुछ समझ नहीं आया कि दुनिया का संघर्ष क्या है। चार लोग क्या हैं, क्या ही करना मुझे, इस सोच पर चली लेकिन पिछले कुछ समय से जिन चार लोगों की बात होती है ज़्यादातर वैसे ही लोगों से रूबरू होना पड़ता है। वास्तविक जीवन में और एक पढ़ने - लिखने वाले बच्चे के जीवन के फर्क का संघर्ष, अपने विचारों के लिए संघर्ष, अपने हक़ के लिए संघर्ष की कविताएं इस पुस्तक में आपके पढ़ने के लिए प्रस्तुतु है।

वहां से यहां तक

SKU: 9789357740029
₹110.00Price
  • Author's Name: PREETI DUBEY
    About the Author: मेरा नाम प्रीति दुबे है। मैं वर्तमान में निफ्ट, हैदराबाद में कनिष्ठ अनुवाद अधिकारी के पद पर कार्यरत हूं। मैंने अपनी पहली कविता चौथी कक्षा में लिखी थी। बचपन से ही लिखने पढ़ने का शौक़ रहा है। मेरे जीवन की यात्रा में बहुत सी मुश्किलें आयी हैं और मैं हमेशा ही अपनी जिजीविषा से उनको पार करके आगे निकली हूं। मेरे सच बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे लगता है अगर लोगों कथनी और करनी समान हो जाए तो जीवन बहुत आसान हो जाएगा। यह तभी हो सकता है जब सभी शिक्षित और परिपक्व होंगे। मैं स्वयं को दो साल का मानती हूं क्योंकि दो साल पहले तक माता पिता की छत्रछाया में जीवन इतना आसान था। जीवन में मानसिक, शारीरिक, नौकरी से संबंधित हर प्रकार का कष्ट पीछे छोड़ कर आगे निकलने के लिए तत्पर हूं। अभी तक बहुत की पत्रिकाओं, राष्ट्रीय स्तर k अखबारों में मेरी कविताएं और लेख छप चुके हैं। अभी तक मुश्किलों, इम्तेहानों के बहाने लगा कर लगातार लिखने का कार्य छूटता रहा। अब खुदको बराबर निखारने का प्रयास है।

    Book ISBN: 9789357740029

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