“लड़की नहीं, लड़ती हूँ मैं” एक शक्तिशाली कविता-संग्रह है जिसमें 21 कविताएँ महिलाओं के जीवन के विभिन्न चरणों और संघर्षों को उजागर करती हैं। यह पुस्तक जन्म से पहले रोकी गई साँसों से लेकर दहेज, घरेलू हिंसा, वैवाहिक बलात्कार, सामाजिक बंधनों और असमानताओं तक की सच्चाइयों को सामने लाती है। हर कविता न सिर्फ़ दर्द और पीड़ा को शब्द देती है, बल्कि औरत की अटूट जिजीविषा और भीतर छिपी शक्ति को भी प्रकट करती है।यह संग्रह पाठकों को झकझोरता है, सोचने पर मजबूर करता है और अंततः यह संदेश देता है कि औरत केवल “लड़की” नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो हर ज़ुल्म के खिलाफ खड़ी होकर कहती है — “लड़की नहीं, लड़ती हूँ मैं।”
लड़की नहीं, लड़ती हूँ मैं
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