Description of the Book:
"यह कविता संग्रह उन अनछुए एहसासों, अधूरी चाहतों और पल-पल बदलते भावों का दस्तावेज़ है, जो कभी हमारी आँखों के सामने होते हैं, तो कभी एक स्वप्न की तरह ओझल हो जाते हैं।
""मृगतृष्णा – रेत से बहते शब्द"" में प्रेम, विरह, आशा, भ्रम, और आत्म-खोज के जटिल पहलुओं को शब्दों की लहरों में ढालने का प्रयास किया गया है। ये कविताएँ कभी रेत पर बिखरी यादों की तरह लगेंगी, तो कभी जलती धूप में किसी छांव की तरह। हर पंक्ति में एक अनकही गूंज है, जो पाठक के हृदय में गहराई तक उतरने की शक्ति रखती है।
यह संग्रह उन लोगों के लिए है जो शब्दों में अपनी दुनिया तलाशते हैं, जो खामोशी में छुपे भावों को सुन सकते हैं, और जो जीवन की क्षणभंगुरता में भी एक अनंत सत्य की झलक देखना चाहते हैं।
""कभी-कभी हम जिन ख्वाबों के पीछे भागते हैं, व"
मृगतृष्णा-रेत पर बहते शब्द
Author's Name: शास्त्री गोकला राम
About the Author: "शास्त्री गोकला राम राजस्थान के बाड़मेर जिले के निवासी हैं। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की है और वर्तमान में आचार्य की उपाधि हेतु अध्ययनरत हैं। व्यवसाय से वे राजनीतिक सलाहकारहैं। वे ""काव्य यश"" के सह-लेखक रह चुके हैं, और ""मृगतृष्णा – रेत से बहते शब्द"" उनका पहला व्यक्तिगत कविता संग्रह है, जिसमें जीवन, प्रेम, भ्रम और आत्म-खोज की संवेदनाएँ संजोई गई हैं।" Book ISBN: 9789369538201
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