यह संग्रह मेरी कविताओं का नहीं, मेरे भीतर जगे प्रश्नों, अनुभवों और देखे गए सच का दस्तावेज़ है। जीवन के अलग–अलग पड़ावों पर जो महसूस किया, वही शब्द बनकर उतर आया। माँ, मौन, जिम्मेदारी, गरीबी, प्रेम और क्रांति, ये केवल विषय नहीं, बल्कि हमारे आसपास मौजूद वास्तविकताएँ हैं। इन कविताओं में न कोई बनावट है, न दिखावा। जहाँ शब्द मिले, वहाँ मैंने लिखा; जहाँ मौन था, वहाँ उसे भी जगह दी। यदि इनमें आपको अपना कोई भाव, कोई सवाल या कोई सच्चाई दिखाई दे, तो यही मेरी लेखनी की सार्थकता है। यह संग्रह पाठक से संवाद की एक विनम्र कोशिश है।
बोलती कलम
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