"दूसरी ओर भी मैं ही था : असमंजस की अनुभूतियाँ" उन पलों की कविताओं का संग्रह है, जब मानव स्वयं के ही विचारों के सामने ठिठक जाता है। यहाँ जीवन किसी सीधी रेखा की तरह नहीं चलता, बल्कि प्रत्येक मोड़ पर स्वयं से सामना करता है। इन कविताओं में जबाब कम हैं, आत्मस्वीकृति अधिक है। यह संग्रह आत्मालोचन, मानवीय कमजोरी, चुप्पी, प्रतीक्षा एवं भीतर चलती हलचल को शब्द देता है। यह पुस्तक पाठक को किसी दिशा में नहीं ले जाती—बल्कि उसे उसी स्थान पर ठहराकर, स्वयं को देखने का साहस देती है।
दूसरी ओर भी मैं ही था :
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