यह कविता-संग्रह उन भावनाओं की स्वर-ध्वनि है जिन्हें हम प्रायः महसूस तो करते हैं, पर शब्दों में ढाल नहीं पाते। मेरी दृष्टि में ये भाव मोती की माला के समान हैं— जिन्हें निरंतर आगे बढ़ने की जिजीविषा उस अदृश्य डोर की तरह आपस में संजोए हुए है। इन पंक्तियों में प्रेम है— जो केवल भावनाओं में पनपता नहीं, बल्कि शारीरिक स्पर्श की सीमाओं से आगे बढ़कर आत्मिक उन्मुक्ति की एक मौन अभिलाषा बन जाता है। यहाँ रात का सन्नाटा है— पर आकाश में खिला चाँद अब भी टिका हुआ है। यहाँ अनंत आकाश-सा इंतज़ार है— पर वह किसी भी सीमा में बँधा हुआ नहीं है।
तपिश
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