यह किताब सिर्फ़ कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि उन ख़ामोशियों की आवाज़ है जो अक्सर शब्दों में ढल नहीं पातीं। इन पन्नों में प्रेम है जो इबादत बन जाता है, विरह है जो आदमी को शायर बना देता है, आग्रह है जो सवाल पूछता है, और स्मृतियाँ हैं जो समय से भी जिद्दी होती हैं। यह शायरी कभी राम और रावण के बीच खड़े प्रश्नों से टकराती है, तो कभी लिहाफ़ के भीतर सिमटी हुई सांसों की सरसराहट बन जाती है। कहीं आंखों में ख़ुदा उतर आता है, तो कहीं ज़ख़्मों पर बिना पट्टी के सच बोल दिया जाता है। अगर आपने कभी बहुत महसूस किया है और कह नहीं पाए तो यक़ीन मानिए, इस किताब में आपकी ही कोई पंक्ति आपका इंतज़ार कर रही है।
कशिश
SKU: 9789375107835
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