यह कविता संग्रह कवि की मौलिक रचनाओं का प्रकाशन है। कही प्रेम में जुड़ती आत्माएं दिखती है, कही विरह में बेकल विरहिणी। कही स्त्री का औचित्य भाष्यमान है तो कही मां की पुत्र से प्रेमपूर्ण आकांक्षा। कवियत्री के भाव निर्विकार किसी सरिता की भांति प्रवाहमान और निश्छल है जिसमें पाठक स्वतः ही खुद को खोज लेगा।
उद्बोधन
Author’s Name: डॉ० सुलग्ना भौमिक
About the Author: प्रस्तुत कविता संग्रह की रचनाकार डॉ ० सुलग्ना भौमिक द्वारा की गई।सुलग्ना जी का जन्म अत्यंत ही सुंदर वातावरण में हुआ जहां कला और साहित्य की वैभवशाली परंपरा विद्यमान थी। वाराणसी के पवित्र केदार खंड में स्व ०डॉ ० केदारनाथ भौमिकऔर स्व ० नूपुर भौमिक की ये तृतीय संतान के रूप में पैदा हुई। कई कविता गोष्ठियों में अपनी प्रस्तुति दे चुकी सुलग्ना की रचना शैली परंपरागत से भिन्न वैयक्तिक है जहां अनुभव ही अभिव्यक्ति का पर्याय है। प्रेम, परिणय, सुख, दुख, विश्वास, छल, विरह, मिलन सबकुछ ही उनके काव्य के विषय है अतः उनकी रचना को किसी विशिष्ट शैली में श्रेणी बद्ध नहीं किया जा सकता।
Book ISBN: 9789372133677
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