“अन्तर्मन के शैवाल” मन की उन गहराइयों की यात्रा है, जहाँ विचार ठहरे जल की तरह स्थिर भी हैं और अशांत भी। इन कविताओं में जीवन के मौन क्षणों, वियोग, असंतोष और आत्म-संघर्ष की परछाइयाँ झिलमिलाती हैं। यह संग्रह किसी विचारधारा का घोष नहीं, बल्कि भीतर की उस आवाज़ का प्रतिध्वनन है जो बोलने से पहले ठहर जाती है। इन पंक्तियों में व्यक्ति की विफलता, विवशता और मौन प्रतिरोध एक साथ सांस लेते हैं—जैसे ठहराव के भीतर भी कोई अनदेखा प्रवाह अब भी बह रहा हो।
अंतर्मन के शैवाल
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