Description of the Book:
"तुम मुस्कुराते रहा करो, उदास बैठे अच्छे नहीं लगते।"
और फिर जिस शख़्स के ये लफ़्ज़ थे वही बन के बैठ गया मेरी उदासी का सबब और कहीं छीन के छुपा दी उसने मेरी मुस्कुराहट।
"सो जाओ, अच्छा लगेगा। रात राहत के लिए होती है…"
नींद के साथ हमारे रिश्ते अच्छे हुआ करते थे। किसी ने आ कर पूरा हिसाब बिगाड़ दिया, नींद अब देख कर सलाम तक नहीं करती। रात की राहतें किनारे रख, सहर-ए-सुकून तक दफ़नाई है।
"तुमने लिखना बंद कर दिया?"
अगर ख़ुशी के चार दिन में भी लिखने के लिए कलम ढूँढ़ने लग जाते तो धिक्कार है।
ग़लत और सही के दरमियान क़ाज़ी को फ़ैसला सुनाना हो तो उसमें ही हज़ार मुश्किलें आती हैं, और अगर कहानी के सारे किरदार ही ग़लत हों तो?
सब अपनी जगह कुछ सही। सब दूसरे के नज़रिये से ग़लत।
किसी की जीत तो किसी की हार। हारा हुआ भी नाराज़ और जो जीता वो भी ना-ख़ुश। इतनी पेचीदा कहानी होती तो पन्ने फाड़ के फेंक देते या काग़ज़ को जला कर राख कर देते, पर बदक़िस्मती से ये सारे किरदार एक ही चार-दीवारी में गुज़ारा करने के लिए मजबूर हैं।
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SKU: 9789360943196
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