"अक्सर हमारी बातों का अर्थ, बातों की शाब्दिकता से कहीं ज्यादा सामने वाले की मानसिकता/मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। फिर प्रतिक्रिया, यदि आपकी अपेक्षा के विपरीत हुईं और इतनी विपरीत हुईं कि उसमें उपेक्षा की बू आने लगे, तो आप एक लंबी त्रासदी से गुजरने को बाध्य होते हैं। फलत: आप धीरे-धीरे एक मौन ओढ़ लेते हैं। मौन के उस चादर के नीचे संवाद फिर भी जारी ही रहता है। हाँ, तब यह संवाद बहिर्मुखी न होकर अन्तर्मुखी हो जाता है।
‘मुखर मौन’ ऐसे उन तमाम पलों का संकलन है जिनमें संवाद चला है और बेसाख्ता चला है पर बिना कोई शोर मचाए। मन की मौन बातें मन से हुई हैं जो रूपायित हैं शब्दों में। आप चाहें तो इसे कविता का नाम दे सकते हैं। "
मुखर मौन
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Author's Name: विजय अग्रहरि 'आलोक' About the Author: देश के कई केन्द्रीय विद्यालयों में 34 वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ाने के बाद सन 2023 में रिटायर हुआ | जिंदगी ने खूब आजमाया है मुझे| 2008 में ब्रेन हैमेरेज के बाद दाएं पार्श्व के पक्षाघात की सौगात मिली | फिर 2023 और 2025 में स्टेंट के रूप में दिल पर चार पैबंद लगे| अब दिलोदिमाग दोनों से अच्छी तरह मजबूत होकर रिटायर्ड लाइफ के लुत्फ ले रहा हूँ | संवेदनशीलता और लेखन पिताजी से विरासत में मिली थी | वैसे तो प्रयागराज की पैदाईश है पर मौजूदा वक्त लखनऊ में अपने मकान में रहता हूँ| बातें कभी कुरेदती है तो कागज पर उतर जाती हैं | Book ISBN: 9789369531295
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