यह संग्रह उन भावनाओं की आवाज़ है, जो अक्सर पुरुषों के भीतर कहीं गहराई में दबी रह जाती हैं — गाँव की मिट्टी की सौंधी खुशबू, माँ की ममता, एकतरफ़ा प्रेम की कसक, और शहर की चकाचौंध में खोते सुकून की टीस। "पुराना पता", "पुरुषों के पास कोई मायका नहीं होता", "भले ही एक तरफ़ा सही", और "चाहत है" जैसी कविताएँ न केवल लेखक की आत्मा की पुकार हैं, बल्कि हर उस दिल की कहानी हैं जो अपनों से दूर होकर भी उन्हें हर साँस में जीता है। यह किताब एक सफ़र है — बचपन से जवानी तक, गाँव से शहर तक, रिश्तों से ख्वाहिशों तक, और अंततः उस सच्चाई तक जहाँ शब्द ही सहारा बनते हैं। यह सिर्फ़ कविताएँ नहीं हैं — यह जीवन की परतें हैं, जिन्हें पढ़ते हुए शायद आप भी अपने भीतर कहीं लौट जाएँ।
मन की गठरी
SKU: 9789372139877
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Author’s Name: दिवाकर
About the Author: "दिवाकर मेरठिया राजस्थान के झुंझुनूं ज़िले के छोटे से गाँव सिंघाना से ताल्लुक रखते हैं। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, लेकिन दिल से एक संवेदनशील रचनाकार। वे स्वयं को लेखक नहीं मानते — बस जब मन भर आता है या दिमाग़ कोई कहानी बुनता है, तो उसे काग़ज़ पर उतारने की कोशिश करते हैं। उनकी लेखनी प्रेम, गाँव, रिश्ते, अकेलापन और अधूरे एहसासों के इर्द-गिर्द घूमती है। यह संग्रह उनकी पहली पुस्तक है — एक ऐसा भावनात्मक दस्तावेज़, जो उनके भीतर की आवाज़ को शब्दों में ढालता है। हर कविता एक ऐसा आईना है, जिसमें पाठक अपने ही जीवन की झलक देख सकता है। दिवाकर की लेखनी उन भावनाओं को शब्द देती है, जो अक्सर पुरुषों के भीतर कहीं गहराई में दबी रह जाती हैं — और यही उन्हें एक अलग पहचान देती है। "
Book ISBN: 9789372139877
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