Description of the Book:
मेरी यह काव्य श्रृंखला- प्रयाण मेरे अंतःसफर के अविस्मरणीय अनुभव, एहसास और मेरी व्यक्तिगत सोच व चिंतन धारा संजोए हुए है।
प्रयाण के प्रारंभ में जहाँ 'बचपन' कविता में बाल्यकाल के निश्छल पलों को पुनः जीने की तीव्र आकांक्षा है तो वहीं एक लंबे अंतराल के बाद लिखी गई कविता- 'बुढ़ापा जीवन का स्वर्णिम पड़ाव' में बुढ़ापे को एक अनोखी उपलब्धि अनुभव करती पंक्तियाँ।
'तमसो मा ज्योतिर्गमय' कविता के द्वारा अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का मेरा अंतः सफर प्रारंभ होता है और शब्दों के जादूगरों की एक अलौकिक दुनिया में मेरा प्रवेश।
कुछ गूढ़ विषय जो मेरे दिल के बहुत करीब हैं, जैसे कि - मौन ,भाग्य, समय, नारी मुक्ति, मोह और प्यार आदि, उन्हें भी मैंने अपनी रचनाओं में स्वर दिया है।
'और कितनी बली', 'बीमार मानसिकता', 'मुखौटा', 'छुट्टी का और एक दिन' सामाजिक सरोकार से जुड़ी कविताएँ हैं।
मेरे सर्वस्व में आध्यात्मिक भाव बड़े प्रखर और अनोखे रूप में व्यक्त हुआ है।
यह मेरा पहला काव्य संकलन है मुझे सिर्फ आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि दिल की बात दिल तक ज़रूर पहुँचेगी।
धन्यवाद!
प्रयाण (अंतः सफर )काव्य श्रृंखला- कविता कोठारी
Author's Name: KAVITA KOTHARI About the Author: संप्रति- शिक्षिका,लेखिका विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख व कविता प्रकाशित विभिन्न साझा संकलन- मुक्ति, माता-पिता आदि(कविता) E-mail: kavitakothari1965@gmail.com Book ISBN: 9789358735291
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