Description of the Book:
बीमारियाँ लिखवाती हैं; बदन की नहीं, भावनाओं की। हरारतें हैं ये सब, कविताओं के हिजाब में। इन पन्नो में दशकों का बलगम है, नज़रियों का एक्सरे है, अल्फ़ाज़ों की चीत्कार है, इश्क़-मोहब्बत की उबकाई है, और अंतर्द्वंद की ऐंठन। “क़लम को ज़ुख़ाम” वह ज्वर है जो सबको होना चाहिये, आजीवन. इसकी तपिश, आत्मविश्वास देती है, रास्ते खुलवाती है, और ज़ुबान भी। ज़िंदगी की पैथोलॉजी हर शख़्स की जाँच करती है, इन कविताओं और जुमलों में मेरे क्षणों की रिर्पोट है। उम्मीद है, मेरी क़लम सा ज़ुख़ाम आपकी क़लम को भी लगेगा, और किसी दिन हम साथ बैठ एक दूसरे के मर्ज़ का हिसाब लेंगे, तसल्ली बांधेंगे। किसी दिन, ज़रूर।
क़लम को ज़ुक़ाम है
SKU: 9789358734348
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Author's Name: Rohit Dubey About the Author: लखनऊ में पले बढ़े रोहित दुबे, मुम्बई में स्थित गोरगाँव इलाक़े के एक भुतहा घर में, चार साल से उसी भूत के संग रह रहे हैं। शहर महँगा है, उनके लिए भी, भूत के लिए भी...वरना दोनों कब का बांद्रा शिफ्ट हो गए होते। एक विज्ञापन कंपनी में क्रिएटिव डायरेक्टर हैं। हर महीने, छोटी सी तनख्वा, बड़ी किताबो में तब्दील हो जाती है; भूत का भी मन लगा रहता है, इनका भी। हाँ कभी कभार, भूत इन पे सवार भी हो जाता है, (आख़िर भूत है) तब ये पगला के पन्नो पे अंट-संट उगल देते हैं। अगर आप इनका लिखा कुछ पढ़ रहे हैं, और पसंद न आये तो समझियेगा, सब भूत का किया-धरा है। Book ISBN: 9789358734348
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