Description of the Book:
दौर ऐसा आया की अब वक़्त ही न रहा ठहरने का। भागते भागते मंज़िलो को हासिल करने में जुट चुके है; कामयाबी और ख़ुशी के पलों को इक्कठा करने में लग जो गए है। ऐसे में रिश्तों की डोर कुछ पक्की रहती है और कुछ कच्ची। पक्के रिश्ते उतार-चढ़ाव के बावजूद टिके रहते है,जबकि अकसर, कच्चे डोर टूट जाते है। इन सबसे अलग ऐसे कुछ कच्चे बंधन होते है, नाज़ुक से कमज़ोर से टूटने का डर तो बड़ा रहता है, पर बिल्कुल चुंबक की तरह पास खींच लेती है।। बिखरने के पश्चात,कच्चे धागों को गांठ बांधकर जोड़ा जाता है। कहते हैं, प्यार की कमी को पूरी करने में सचाई और सम्मान का रस अपना सहयोग देती है। क्या पता यह रस भी गांठ की तरह कच्चे रिश्तों को बांधे रखे? मजबूरी में नहीं, पर खोया हुआ वजूद से फिर मुलाकात हो जाए।। कच्चे धागे भी पक्के लग जाए! ऐसी एक दास्तान पेश है- कच्चे धागे
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