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Description of the Book:

 

यह पुस्तक मूलतः समय-समय पर मेरे मन से निकले और उपजे विचारों पर आधारित है जो दिल से उन्मुक्त हो निकले, को कलमबंद करने का प्रयास है। जिंदगी के हर मोड़/पड़ाव पर यह दर्द, लगाव और प्यार मैंने महसूस किया है। मैंने हमेशा प्रकृति से प्यार करने, प्यार को जताने, और उससे उपजे रोष को प्रकट करने के विभिन्न तरीकों को सीखा है। मैंने महसूस किया है, प्रकृति को, अपने बेहद नजदीक और करीब, जब भी मैंने अपने आपको महसूस किया है बिल्कुल अकेला, उस वक़्त यह हमेशा मेरी दोस्त बन, मौन रह, और हाँ, एक मजबूत ढ़ाल बन मेरा हौसला बढ़ाती और नए अनुभव सिखाती रही।
          ये उद्गार अन्यथा नहीं, एक विचार हैं, प्रेम के, सौहार्द से परिपूर्ण समर्पण के, प्यार के इज़हार के और सबसे अधिक अपनों से बिछड़ने के। ये उद्गार हमेशा सभी के अंदर होते हैं जिसे निकालना, एक माध्यम के जरिये अति-आवश्यक होता है। कभी ना कभी सभी को इस प्रकार की परिस्थितियों से गुजरने का अवसर मिलता है और जिंदगी उन्हें नए अनुभव, नए अध्याय और नयी कहानियाँ सीखा जाती है, जो उनकी जिंदगी के सबसे अनमोल पल होते हैं। ये पल खुशियों से भरे हो सकते हैं, और दुःखों से भी।
           कभी, किसी से प्यार करना और बिना मिलन उससे बिछड़ जाना, चाहे वह किसी की प्रेयसी हो, एक सैनिक हो, किसी के दिल के बेहद करीब उसका अपना घर, खेत-खलिहान हो, घरों में पाले जाने वाले जानवर हो और सबसे अधिक उसे जन्म देने वाली माँ, पालने वाली दादी माँ, कंधे पर घुमाने वाले दादा, कठिन समय में उंगली पकड़ मंज़िल का रास्ता बताने वाले पिता, बेइंतहाँ प्यार करने वाली पत्नी और बच्चे, या उसकी टोली के जवान, सब उसके दिल के बेहद ही नजदीक/करीब होते हैं। ये तब तक उसके दिल और मस्तिस्क में जीवित रहते हैं जब तक वह स्वयं जीवित रहता है। हाँ, युद्ध किसी सैनिक को अक्सर ऐसे ज़ख्म दे जाती है जो उसे हमेशा ताउम्र कचोटती रहती है, और छीनती रहती है उसकी ज़िंदगी से पल और उम्र। जब किसी सैनिक के जिंदगी से उसके साथ का, उसके बगल वाली चारपाई का, वह जिसके साथ उसने व्यतीत किए होते हैं पल सुख के, दुःख के, वह छोड़ दे उसका साथ, तो ले जाता साथ अपने वह, उस सिपाही की उम्र भी। हाँ, चाहे वह लड़ा हो उसे बचाने, उठाया हो रक्तरंजित उसे, लगाई हो मरहम घावों को, पर ना मानती दुनियाँ हुआ होगा कुछ ऐसा, क्योंकि स्वार्थी है, यह दुनियाँ और उसमे रहने वाले। उन्हें दूसरों की तकलीफ, दुःख़, दर्द और अविरल आँखों से बहने वाले आँसुओं से कोई फर्क नहीं पड़ता। 
           अक्सर सुना है लोगों से मैंने “है, बहादूरी और बेवकूफी के बीच एक महीन सी रेखा”। यह वाक्य बेहद ही डरावनी है उसके लिए, जिसने बहदुरी से लड़ी लड़ाई, बचाने देशद्रोहियों से अपने देश को, इसके नागरिकों को। देश के नागरिकों की सुरक्षा के खातिर, त्याग कर अपनी दुनियाँ और प्राण साथ ही सब कुछ उन अनमोल पलों के साथ। मैं नहीं मानता इस वाक्य को, क्योंकि, होते हैं बहादुर तो हमेशा बहादुर ही। 
           अंततः इस किताब मे शामिल सभी घटनाएँ, स्थितियाँ, व्यक्ति, नाम वा स्थान काल्पनिक हैं, अगर इनमें से किसी घटना, व्यक्ति या स्थिति से कोई समानता होती है तो इसे मात्र एक संयोग समझा जाए।

Arushi || BookLeaf Publishing, 18:14
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               यह पुस्तक मूलतः समय-समय पर मेरे मन से निकले और उपजे विचारों पर आधारित है जो दिल से उन्मुक्त हो निकले, को कलमबंद करने का प्रयास है। जिंदगी के हर मोड़/पड़ाव पर यह दर्द, लगाव और प्यार मैंने महसूस किया है। मैंने हमेशा प्रकृति से प्यार करने, प्यार को जताने, और उससे उपजे रोष को प्रकट करने के विभिन्न तरीकों को सीखा है। मैंने महसूस किया है, प्रकृति को, अपने बेहद नजदीक और करीब, जब भी मैंने अपने आपको महसूस किया है बिल्कुल अकेला, उस वक़्त यह हमेशा मेरी दोस्त बन, मौन रह, और हाँ, एक मजबूत ढ़ाल बन मेरा हौसला बढ़ाती और नए अनुभव सिखाती रही।
          ये उद्गार अन्यथा नहीं, एक विचार हैं, प्रेम के, सौहार्द से परिपूर्ण समर्पण के, प्यार के इज़हार के और सबसे अधिक अपनों से बिछड़ने के। ये उद्गार हमेशा सभी के अंदर होते हैं जिसे निकालना, एक माध्यम के जरिये अति-आवश्यक होता है। कभी ना कभी सभी को इस प्रकार की परिस्थितियों से गुजरने का अवसर मिलता है और जिंदगी उन्हें नए अनुभव, नए अध्याय और नयी कहानियाँ सीखा जाती है, जो उनकी जिंदगी के सबसे अनमोल पल होते हैं। ये पल खुशियों से भरे हो सकते हैं, और दुःखों से भी।
           कभी, किसी से प्यार करना और बिना मिलन उससे बिछड़ जाना, चाहे वह किसी की प्रेयसी हो, एक सैनिक हो, किसी के दिल के बेहद करीब उसका अपना घर, खेत-खलिहान हो, घरों में पाले जाने वाले जानवर हो और सबसे अधिक उसे जन्म देने वाली माँ, पालने वाली दादी माँ, कंधे पर घुमाने वाले दादा, कठिन समय में उंगली पकड़ मंज़िल का रास्ता बताने वाले पिता, बेइंतहाँ प्यार करने वाली पत्नी और बच्चे, या उसकी टोली के जवान, सब उसके दिल के बेहद ही नजदीक/करीब होते हैं। ये तब तक उसके दिल और मस्तिष्क में जीवित रहते हैं जब तक वह स्वयं जीवित रहता है। हाँ, युद्ध किसी सैनिक को अक्सर ऐसे ज़ख्म दे जाती है जो उसे हमेशा ताउम्र कचोटती रहती है, और छीनती रहती है उसकी ज़िंदगी से पल और उम्र। जब किसी सैनिक के जिंदगी से उसके साथ का, उसके बगल वाली चारपाई का, वह जिसके साथ उसने व्यतीत किए होते हैं पल सुख के, दुःख के, वह छोड़ दे उसका साथ, तो ले जाता साथ अपने वह, उस सिपाही की उम्र भी। हाँ, चाहे वह लड़ा हो उसे बचाने, उठाया हो रक्तरंजित उसे, लगाई हो मरहम घावों को, पर ना मानती दुनियाँ हुआ होगा कुछ ऐसा, क्योंकि स्वार्थी है, यह दुनियाँ और उसमे रहने वाले। उन्हें दूसरों की तकलीफ, दुःख़, दर्द और अविरल आँखों से बहने वाले आँसुओं से कोई फर्क नहीं पड़ता।
           अक्सर सुना है लोगों से मैंने “है, बहादूरी और बेवकूफी के बीच एक महीन सी रेखा”। यह वाक्य बेहद ही डरावनी है उसके लिए, जिसने बहदुरी से लड़ी लड़ाई, बचाने देशद्रोहियों से अपने देश को, इसके नागरिकों को। देश के नागरिकों की सुरक्षा के खातिर, त्याग कर अपनी दुनियाँ और प्राण साथ ही सब कुछ उन अनमोल पलों के साथ। मैं नहीं मानता इस वाक्य को, क्योंकि, होते हैं बहादुर तो हमेशा बहादुर ही।
           अंततः इस किताब मे शामिल सभी घटनाएँ, स्थितियाँ, व्यक्ति, नाम वा स्थान काल्पनिक हैं, अगर इनमें से किसी घटना, व्यक्ति या स्थिति से कोई समानता होती है तो इसे मात्र एक संयोग समझा जाए।
 

उदगार : मन के

SKU: 9789357747721
₹110.00Price
  • Author's Name: मनीष कुमार
    About the Author: मनीष कुमार का जन्म बेगुसराय, बिहार के एक छोटे से कस्बे गोखले नगर विष्णुपुर, में 30 जनवरी 1984 को हुआ। इनके द्वारा अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव से एवं उच्च शिक्षा खगड़िया, बिहार से प्राप्त की गयी। लेखक इतिहास में स्नातक की उपाधि प्राप्त हैं। इनके द्वारा रचित कृतियाँ बिहार से प्रकशित होने वाली मासिक पत्रिका “द लाइट ऑफ बिहार” में प्रकशित होती रही और कौशिकी पत्रिका एवं दैनिक जागरण तथा हिंदुस्तान समाचार पत्र में भी प्रकशित होती रही। इन्हें नेहरु युवा केंद्र संगठन, खगड़िया, बिहार के द्वारा उनकी कविता जो “जंग-ए-आज़ादी-1857” विषय पर थी के लिए जिला स्तर पर सम्मानित किया गया। साथ ही उनकी कृति को अखिल भारतीय हिन्दी युवा काव्य लेखन प्रतियोगिता जो “प्रथम स्वाधीनता संग्राम-1857” के अंतर्गत थी और इसे नेहरू युवा केंद्र संगठन, भारत सरकार के द्वारा आयोजित किया गया था में “तृतीय’ स्थान प्रदान किया गया।
    Book ISBN: 9789357747721

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